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सफलता का आधार केवल अंक नहीं, चरित्र और संस्कार भी जरूरी : डीजी सूचना बंशीधर तिवारी*
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विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार विकसित उत्तराखंड की आधारशिला : मुख्यमंत्री*
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प्रतिभा सम्मान समारोह में मेधावी विद्यार्थियों का सम्मान, मुख्यमंत्री ने बढ़ाया उत्साह*
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मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी ने विजय कारगिल दिवस पर वीर सैनिकों, पूर्व सैनिकों और वीरांगनाओं को किया सम्मानित*
मुख्यमंत्री ने प्रदान की विभिन्न विकास योजनाओं एवं निर्माण कार्यों के लिए ₹ 62 करोड़ की वित्तीय स्वीकृति।*
एसजीएसटी संग्रहण में 24 फीसदी की वृद्धि* *उत्तराखण्ड में राज्य कर विभाग की उल्लेखनीय सफलता* *12 फीसदी बढ़ा कुल जीएसटी संग्रहण*
मुख्यमंत्री ने ‘रन फॉर कारगिल हीरोज’ मैराथॉन को दिखायी हरी झंडी*  *शौर्य स्थल पर पुष्पचक्र अर्पित कर शहीदों को दी श्रद्धांजलि*
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मुख्यमंत्री ने जन समस्याओं के त्वरित एवं समयबद्ध समाधान के दिए निर्देश*  *मुख्यमंत्री कैंप कार्यालय स्थित मुख्य सेवक सदन में विभिन्न क्षेत्रों से आए लोगों की सुनी समस्याएं*
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कानून का भय ही नहीं

कानून का भय ही नहीं

आखिर देश में कानून और सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का यह हाल क्यों हो गया है कि एक कंपनी उसकी तनिक परवाह नहीं करती? क्या इसका कारण गुजरे वर्षों में हुई बड़ी परिघटनाएं नहीं हैं, जिनमें कानून के राज की धज्जियां उड़ाई गई हैं? सुप्रीम कोर्ट ने पतंजलि आयुर्वेद के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही इस वजह से शुरू की है कि इस कंपनी ने उसके पहले के आदेश का पालन नहीं किया। कोर्ट ने अपनी दवाओं के बारे में मीडिया में भ्रामक विज्ञापन देने से उसे मना किया था। लेकिन कंपनी ने कोर्ट में हलफनामा देने के बावजूद उसकी परवाह नहीं की। जैसाकि कि दो जजों की पीठ ने कहा, यह कंपनी अपने इश्तहार में औषधि एवं जादू-टोना उपचार (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम-1954 का उल्लंघन कर रही है।

ऐसा खुलेआम चल रहा है और केंद्रीय आयुष मंत्रालय ने भी इस पर कोई कार्रवाई नहीं की है। न्यायालय ने इस पर आक्रोश जताया। आयुष मंत्रालय से कहा- सारे देश की आंख में धूल झोंकी गई है। और आपने अपनी आंख बंद कर रखी है। दो साल से आप इस महत्त्वपूर्ण घटना (यानी न्यायिक आदेश) का इंतजार कर रहे हैं, जबकि औषधि कानून से खुद यह स्पष्ट है कि ऐसे विज्ञापन प्रतिबंधित हैं। यह मामला इंडियन मेडिकल एसोसिएशन सुप्रीम कोर्ट ले गया है। अब एक बार फिर से कोर्ट ने प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में ऐसे विज्ञापनों के प्रकाशन या प्रसारण पर रोक लगाने को कहा है। मगर इस क्रम में यह विचारणीय है कि आखिर देश में कानून और सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का यह हाल क्यों हो गया है कि एक कंपनी उसकी तनिक परवाह नहीं करती? क्या इसका कारण गुजरे वर्षों में हुई बड़ी परिघटनाएं नहीं हैं, जिनमें खुद सत्ता-तंत्र के ऊंचे स्तरों पर बैठे लोगों के संरक्षण में कानून के राज की धज्जियां उड़ाई गई हैं?

जब एक स्तर पर ऐसी घटना होती है और सरकार से लेकर न्यायपालिका तक उसकी परवाह नहीं करतीं, तो फिर सबको यही संदेश जाता है कि कानून सबके लिए समान नहीं है, ना ही यह सबसे ऊपर है। पतंजलि आयुर्वेद जैसी कंपनियां धन और सत्ता-तंत्र तक पहुंच के लिहाज से प्रभावशाली मानी जाती हैं। ऐसे में अगर उसके अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का अनादर किया, तो उसे आज के व्यापक संदर्भ में रखकर ही देखा जाएगा। उस संदर्भ में जिसमें रसूखदार लोग खुद को कानून से ऊपर समझने लगे हैं।

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