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जानिए कब मनाई जाएगी “वसंत पंचमी”। उत्तराखंड में कैसे मनाई जाती है वसंत पंचमी

जानिए कब मनाई जाएगी “वसंत पंचमी”। उत्तराखंड में कैसे मनाई जाती है वसंत पंचमी

पौड़ी। माघ महीने की शुक्ल पक्ष की पंचमी वसंत पंचमी कहलाती है। वसंत पंचमी से ऋतुराज वसंत का आगमन होता है, पेड़ पौधों में नई कोंपले आने लगती हैं, चारों तरफ फूल खिलने लगते हैं। धरती माता दुल्हन की तरह सज संवर जाति है। खेतों में गेहूं जौ की बालियां आ जाती हैं और सरसों के फूलों से खेत पीले दिखने लगते हैं। भंवरे और रंग बिरंगी तितलियां फूलों पर मंडराने लगती हैं।

उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल में वसंत पंचमी का त्योहार धूम धाम से मनाया जाता है। इस दिन से खेतों में (हलजोत)  बुआई का काम शुरू हो जाता है। घर की महिलाएं एक टोकरी में पूजन सामग्री के साथ बीज और खाद लेकर खेत में जाते हैं और पूजा करके, धरती से अच्छी उपज की प्रार्थना करके बीज बोते हैं। जिनके बैल नहीं होते वे कुदाल से ही बीज की बुआई करके हलजोत की रीति को पूरा करते हैं।

इस दिन लोग सुबह उठकर स्नान करके लिपाई करने के बाद , भूड़े पकोड़े, मीठे स्वाल, दाल और आलू के भरे स्वाल, मीठे गुलगुले आदि अनेक प्रकार के पकवान बनते हैं।

 

वसंत पंचमी के दिन देवप्रयाग संगम पर स्नान करने का विशेष महत्त्व है, इसके अलावा व्यासघाट, हरिद्वार, ऋषिकेश, सतपुली नयार नदी के तट पर दंगलेश्वर महादेव, हेंवल नदी के किनारे त्रिवेणी आदि अनेक स्थानों पर लोग समान करने जाते हैं। देवप्रयाग, सतपुली और कण्वाश्रम कोटद्वार में मेला लगता है।

इस दिन घर की चौखट, अन्न के (भंडार) कोठार, कुन्ना, दबला में गाय के गोबर के साथ जौ की हरियाली लगाई जाती है। वसंत पंचमी का विशेष महत्व है, इस दिन विद्या की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती माता की पूजा की जाती है।

उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में पलटन एवं लोगों की जीवन शैली बदलने के कारण त्योहारों का स्वरूप भी बदल गया है। कई पौराणिक और प्राचीन मेले बंद हो गए हैं, जिसके कारण हमारी संस्कृति का स्वरूप भी बदल रहा है। हम सबकी जिम्मेदारी है कि हमारे पर्व एवं त्योहार पहले की भांति चलते रहें।

 

 

 

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