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नीति आयोग की बैठक में मुख्यमंत्री धामी ने प्रस्तुत किया उत्तराखंड के विकास का रोडमैप*
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मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर उनके सफल नेतृत्व के 12 वर्ष पूर्ण होने पर दी शुभकामनाएं।*
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मुख्यमंत्री ने विभिन्न विकास योजनाओं एवं निर्माण कार्यों के लिए प्रदान की ₹ 89 करोड़ की वित्तीय स्वीकृति*
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सच हो रहा विकसित भारत का संकल्प – मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी
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*न्याय व्यवस्था को अधिक समावेशी, सुलभ एवं सुदृढ़ बनाने में “जूडिशियम 2.0” महत्वपूर्ण पहल : मुख्यमंत्री*
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ब्रिक्स मंच पर चमका उत्तराखंड का आपदा प्रबंधन मॉडल, सिल्क्यारा रेस्क्यू की गूंज अंतरराष्ट्रीय स्तर तक*
6 करोड़ रुपए से जनपद अल्मोड़ा में कराई जाएगी तारबाड़। खेती होगी सुरक्षित : मुख्यमंत्री*
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक पेड़ मां के नाम अभियान के अंतर्गत मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी ने अपनी पूज्य माता जी के नाम से पौधा रोपित किया*
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अंबानी-अडानी, खरबपतियों का चंदा कहां?

अंबानी-अडानी, खरबपतियों का चंदा कहां?

हरिशंकर व्यास
कैसी हैरानी की बात है कि मोदी राज में सबसे ज्यादा धंधा खरबपतियों का बढ़ा। अडानी जगत सेठ हुआ। अंबानी कुबेरपति हुआ। पैसे से भारत की संस्कृति का ढिंढोरा करता है। इनके साथ टाटा, बिड़ला सहित टॉप के बीस खरबपति दिन-दुनी, रात-चौगुनी की रफ्तार से भारत के लोगों से पैसा कमाते हुए हैं लेकिन वे इलेक्टोरल बॉन्ड्स खरीददारों की लिस्ट से लगभग गायब। यों कुछ जानकार शेल याकि खोखा कंपनियों से बॉन्डस लेन-देन की बारीकी तलाश रहे हैं। लेकिन मोटा मोटी मोदी सरकार की इलेक्टोरल बॉन्ड योजना में जुआरियों, सटोरियों, काला बाजारियों और ठेकेदारों से ही चुनाव और राजनीति के नाम पर वसूली हुई दिखती है। और यह हैरानी की बात है।

तभी अपना सवाल है कि सरकारी प्रोजेक्टों और मुंबई, दिल्ली आदि महानगरों के ठेकेदारों, बिल्डरों की इलेक्टोरल बॉन्ड्स खरीदने-देने के साथ सौदेबाजी का यदि सीक्वेंस है तो भला विनिवेश, खान आवंटन से लेकर अंतरराष्ट्रीय सौदों, खरीद-फरोख्त के खरबपतियों के कारोबार की वसूली का क्या रूप है? जब चिंदीमार, खोखा कंपनियों को ईडी, सीबीआई, आईटी से लाइन हाजिर करा वसूली हुई है तो खरबपतियों के लेवल का चंदा कहां गया? क्या इस रीति-नीति पर चला गया कि छोटे कारोबारी भाजपा पार्टी के लिए और वैश्विक खरबपति किसी और काम के लिए?

भला और क्या काम हो सकता है? आप ही अनुमान लगाएं। लुटियन दिल्ली में जितने मुंह उतनी बात है। मगर इतना तय है कि भारत के टॉप सौ अरबपतियों की कंपनियों में बिना इलेक्टोरल बॉन्ड्स के कई नाम निकल आएंगे। और फिर यदि इनकों नौ वर्षों में मिली सरकारी कंपनियों, विनिवेश, लाइसेंसों की पूरी सूची के साथ तुलना करें तो वह क्या आंख खोल देने वाली नहीं होगी?

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